Monday, April 2, 2012

शाख से टूटा हर पत्ता...













शाख से टूटा हर पत्ता, बस एक कहानी कहता है,
कल गुज़रे बीते लम्हे की, धूमिल सी निशानी कहता है,
वो गिरते सूखे पत्तों में, जर होती क्यूँ मेरी काया,
वो पड़ते पीले पत्तों में, खोती क्यूँ मेरी छाया,
उन बिखरे सूखे पत्तों में, वो बात पुरानी कहता है,
शाख से टूटा हर पत्ता, बस एक कहानी कहता है,
कल बीते गुज़रे लम्हे की, धूमिल सी निशानी कहता है...

कभी कुचला-मुचला क़दमों ने, तो कभी तोड़ा-मोड़ा राहों ने,
जो शान कभी थे तरुवर के, उन्हें कुचला-मुचला राहों ने,
कल जो सावन झूम के आया, बरखा ऋतू भी संग में लाया,
गरजे बदरा, भीगा तरुवर, भीगी कैसी मेरी काया,
गुज़रा लम्हा वो बीता कल, गुज़रा सावन आया पत-झड़,
जो शान कभी थे तरुवर के, उन्हें कुचला-मुचला राहों ने,
जो जान कभी थे तरुवर के, उन्हें तोड़ा-मोड़ा राहों ने,
वक़्त बदलता है जो रहता, राह बदलती जाती है,
समय का पहिया है जो चलता, बात बदलती जाती है,
मैं, शाख से टूटा हूँ पत्ता, बस एक कहानी कहता हूँ,
कल गुज़रे बीते लम्हे की, धूमिल से निशानी कहता हूँ,
गर! पड़े रहे यूँ राहों में, धूमिल होगी अपनी काया,
निकलों खुद के क़दमों से, बहने दो खुद की छाया,
छंद रचो, कह दो मन की, मरने न दो खुद की काया,
कल सावन जो वो झूम के आएगा, हरी होगी फिर से छाया,
शाख से टूटा हर पत्ता, बस एक कहानी कहता है,
कल गुज़रे बीते लम्हे की, धूमिल सी कहानी कहता है...

Wednesday, March 28, 2012

हो अकेला राह चल तू...
















हो अकेला राह चल तू,
ले नए अरमान चल तू,
राह डगमग, हो अँधेरा,
कल नया सुबह का चेहरा,
ले नयी उड़ान चल तू,
हो अकेला राह चल तू...

वीर बन, तू रण-विजय कर,
नर बन, डर पर विजय कर,
जो रात काली हो अँधेरा,
लाल सूरज, खुशियों का चेहरा,
एक नयी मशाल बन तू,
ले नया आस्मां चल तू,
हो अकेला राह चल तू...

कल सुबह जो आज आई,
खुशियों के आगाज़ लायी,
खुद को पहचान चल तू,
होसलों की नयी उड़ान चल तू,
ले नया जहान चल तू,
हो अकेला राह चल तू...

साथ रिश्ते-नातों के, जो पीछे छोड़ आया तू,
भाव, ममता, प्रेम के, जो तार जोड़ आया तू,
सत, संयम, प्रेम का, एक नया चिराग भर तू,
बाट ममता, प्रेम, करुणा, फिर नयी एक राह चल तू,
हो बुलंद, खुशियों से भर, ले नयी उड़ान चल तू,
राह मंजिल, दूर कश्ती, ले नयी छलांग चल तू,
हो रौशन, कर पथ रौशन, बन नयी मशाल चल तू,
ले नए सुबह का चेहरा, फिर नयी उड़ान चल तू,
हो अकेला राह चल तू...

Monday, March 19, 2012

चल दिया जग में राही बन के...

थक गया हूँ लड़ते-लड़ते,
घुट-घुट कर यूँ मरते-मरते,
खुद से कितने वादे कर के,
चल दिया जग में राही बन के...

तनहा सफ़र क्यूँ लम्बा सा यह,
जाने कितना तनहा सा मैं,
क्यूँ अनजाना राही बन के,
चल दिया खुद से वादे कर के...


एक आस अधूरी प्यास सी,
कुछ बेबस, कुछ अन्यास सी,
यादों का पिटारा भर के,
चल दिया जग में राही बन के,
थक गया खुद से लड़ते-लड़ते,
खुद से कितने वादे कर के,
चल दिया जग में राही बन के...

Monday, March 5, 2012

फिर चोरों का राज हुआ...

फिर चोरों का राज हुआ,
क्यूँ देश फिर बर्बाद हुआ,
हाँ, एक वोट डाल कर भी,
क्यूँ देश का वो कल्याण हुआ,
फिर चोरों का राज हुआ...


फिर चोरों की माया फैली,
गन्दी, कुचली काया मैली,
लालच, भूख, कुर्सी के प्यासे,
देश नोच-नोच कर आपस में बाटें,
एक-दूजे को चोर बताएं,
फिर क्यूँ आपस में मिल-बाट कर खाएं,
क्यूँ, फिर चोरों का राज हुआ,
आज, फिर देश बर्बाद हुआ,
हाँ, एक वोट डाल कर भी,
क्यूँ देश का बंटाधार हुआ,
फिर चोरों का राज हुआ...

Friday, February 3, 2012

गुज़रा उन गलियों से...

गुज़रा, आज उन गलियों से, जहाँ, तेरी कुछ यादें अब भी बाकी थी,
एक अजब सी मुस्कान थी तनहा चेहरे पर, क्यूँ धुंधली यादें जागी थी,
दूरियां दो दिलों में बढ़ गयी,
फिर क्यूँ वो मीठी यादें जागी थी,
गुज़रा उन गलियों से, जहाँ, तेरी कुछ यादें बाकी थी...

शाम का खुशनुमा नज़ारा, था सिमटा धूप में,
वो बाग़, वो कलियाँ, थी खिली वो धूप में,
शाम गुजरी, गुज़र गया कल, हाँथ जैसे रेत सा,
आह बिखरी, अश्क गिरे, फिसल गए सब रेत सा,
दूरियां यूँ बढ़ गयी, क्यूँ गुजरी यादें बाकी थी,
गुज़रा उन गलियों से, जहाँ तेरी मुस्कान बाकी थी...

हर पल तेरी आरज़ू है...

क्यूँ हर पल तेरी जुत्सुजू है,
क्यूँ हर पल तेरी आरज़ू है,
क्यूँ नज़रें बस तुझे ही खोजती है,
क्यूँ बस तेरी ही गुफ्तुगू है...
तेरी नज़रों का तवास्सुर यूँ छाया, कि खोने लगा मैं कहीं,
भीड़ में चलता रहा, रहा तनहा मैं कहीं,
बस दिल ही दिल, तेरी गुफ्तुगू यूँ चलती रही,
बस दिल ही दिल, यह आरज़ू पलती रही,
राह में जाने कितने हसीन नज़ारें थे, फिर क्यूँ यह नज़रें बस तुझे ही खोजती रही,
क्यूँ हर पल तेरी जुत्सुजू चलती रही,
क्यूँ यह आरज़ू पलती रही,
एक नज़र देख, जी भर लेता मैं,
मुस्कुरातें वो होंठ, ज़िन्दगी सजा लेता मैं,
क्यूँ यूँ तनहा सी जुत्सुजू है,
क्यूँ हर पल तेरी आरज़ू है...

कुछ तो असर है...

कुछ तो असर है उन आँखों का, जो तनहा होने नहीं देती,
इस भीड़ के बीच भी अकेला होने नहीं देती,
कभी मुस्कराहट खेलती होंठों पर, तो चेहरे पर रंगत सी कर देती है,
तो कभी भीड़ में तनहा होते ही, तेरी यादों में रुसवा कर देती है,
मैं सोचता हु, क्यूँ मुस्कराहट ज़िन्दगी सी भर देती है,
और न होकर, चेहरों को फीका कर देती है,
कुछ तो असर है उन आँखों का, जो तनहा होने नहीं देती,
इस भीड़ के बीच भी खोने नहीं देती...