Monday, September 12, 2011

दर्द होता है...

दर्द होता है, दिल के नासूरों को छुपा लेता हूँ,
रो कर अपना दामन भिगो लेता हूँ,
कमज़ोर मैं नहीं दिल कमज़ोर है, यह सोच कर नज़रें झुका लेता हूँ,
दर्द होता है, दिल के नासूरों को छुपा लेता हूँ,
कुरेद गया कोई, दिल के नासूरों को,
क़त्ल कर गया कोई, मेरी यादों को,
कमज़ोर मैं नहीं दिल कमज़ोर है, यह सोच कर नज़रें झुका लेता हूँ,
दर्द होता है, दिल के नासूरों को छुपा लेता हूँ,
हिम्मत नहीं है लड़ने की तो रो कर दामन भिगो लेता हूँ…

जला दिया...

जला दिया आज उन रिश्तों को, जो दिल को कभी अज़ीज़ थे,
दबा दिया उन यादों को, जो दिल के कभी करीब थे,
खुद की यादों का जनाज़ा निकाला, खुद बड़े ही शौक से,
कर दिया क़त्ल उन यादों का, जो दिल में कभी अज़ीज़ थी…

Wednesday, September 7, 2011

इस इश्क-मुश्क की खातिर...

जाने कितने शायर-यार हुए, जाने कितने बेकार हुए,
इस इश्क-मुश्क की खातिर, जाने कितने बीमार हुए,
हादसा यह तब हुआ, जब तुझसे आँखें चार हुई,
हादसा यह तब हुआ, जब ख़्वाबों की बरसात हुई,
हम भी फिर गए काम से, बन कर शायर-यार हुए,
जाने कितने शायर-यार हुए, जाने कितने बेकार हुए

हम जो, रो पाते अगर...

जाने कितने दरिया बन जाते अगर, हम जो, रो पाते अगर,
तनहा न छोड़ता कोई मुझको यूँ, न शायर यूँ बन जाता मगर,
दर्द का दुखड़ा न यूँ सुनाता तुझे, अपने दर्द से न यूँ बहलाता तुझे,
जाने कितने दरिया बन जाते अगर, हम जो, रो पाते अगर...

Tuesday, September 6, 2011

मैं आदिम हूँ या शैतान...

मैं आदिम हूँ या शैतान, मेरे लफ़्ज़ों से न ये जान,
दिखता हूँ इंसान, पर सोच बड़ी बद्जान,
पैसे और हवस की भूख, आँखे है बदनाम,
मैं आदिम हूँ या शैतान, मेरे लफ़्ज़ों से न ये जान…

Sunday, September 4, 2011

कुछ अनकही, कुछ अनसुनी...

क्यूँ घुटन सी...
क्यूँ घुटन सी होने लगती है, अरमानों का क़त्ल होते ही,
खूँ के छीटे बिखर जाते है, चेहरे पर आंसुओं की तरह,
क्यूँ बेबस सी लगने लगती है ज़िन्दगी, किसी के जाने से ही,
यादों के छीटे बिखर जाते है, आँखों में ख़्वाबों की तरह,
क्यूँ गम ही गम नज़र आने लगता है, टूटे वादों की तरह,
बीती यादों के चेहरे बिखर जाते है, अधूरी रातों की तरह,
क्यूँ घुटन सी होने लगती है, अरमानों का क़त्ल होते ही,
खूँ के छीटे बिखर जाते है, चेहरे पर आंसुओं की तरह…

सोचा था…
सोचा था, कुछ मीठी बात होगी, आँखों-आँखों में रात होगी,
पर तू न गुज़रा, तेरी रूह न गुजरी, मेरे अरमानों का जनाज़ा गुज़र गया,
दिल के होसलों का क़त्ल कर, मेरे लफ़्ज़ों को यतीम कर गया,
पर तू न गुज़रा, तेरी रूह न गुजरी, मेरे लफ़्ज़ों का जनाज़ा गुज़र गया…

दर्द होता है…
न सोचो इतना ज्यादा कि दर्द होता है,
न कुरेदो दिल के नासूरों को कि दर्द होता है,
घाव भर भी जाते, अगर इतना न चाहते हम किसी को,
वो मरहम की तरह न नज़र आते है कि दर्द होता है,
न कुरेदो दिल के नासूरों को कि दर्द होता है,
न सोचो इतना ज्यादा कि दर्द होता है…

Thursday, September 1, 2011

क्यूँ मर्ज़ सा लगने लगा है...

हर गुज़रता लम्हा, काटने लगा है अंदर से,
हर बहता कतरा, कचोटने लगा है अंदर से,
दर्द बढ़ता जा रहा है, बदलते नासूर की तरह,
क्यूँ मर्ज़ सा लगने लगा है अंदर से…
घड़ी का काँटा, पल-पल इतना भारी होगा, मैंने सोचा न था,
वक़्त का एक-एक पहर, ऐसे गुज़रेगा, मैंने सोचा न था,
क्यूँ दर्द बढ़ता जा रहा है, बदलते दिल में नासूर की तरह,
क्यूँ मर्ज़ सा लगने लगा है अंदर से…