Tuesday, January 3, 2012

दे दो उसको पंख नए...

जोड़ो खुद की कल्पनाओ को, दे दो उसको कुछ पंख नए,
रंग दो सारे चेहरों को, जो काले पड़ गए जंग लगे,
चाहे हरा रंगों या लाल रंगों, हर चेहरा खुश-हाल रंगों,
सबके दुःख और दर्द मिटा कर, हर चेहरा खुश-हाल रंगों...

चेहरे का मोती भी चमके सोना, फीकी पड़ती मुस्कान न हो,
रंग दो सारे चेहरों को, जहाँ अलग-थलक का मान न हो,
जोड़ो खुद की कल्पनाओ को, दे दो उसको कुछ पंख नए,
रंग दो सारे चेहरों को, जो काले पड़ गए जंग लगे,
कुछ-कुछ चेहरों पर लिख दो,
जो आये, जी भर लिख दो,
कोई झूठी सच्ची शान न हो,
दिखावे का सम्मान न हो,
रंग दो सारे चेहरों को, जो काले पड़ गए जंग लगे,
जोड़ो खुद की कल्पनाओ को, दे दो उसको पंख नए...

Monday, January 2, 2012

नज़र बदल कर देख ज़रा...

जो चला गया, सो चला गया,
जो आना है अब उसकी सोच,
नज़र बदल कर देख ज़रा,
हर चेहरे में न तू उसको खोज,
दर्द तेरा जो भी है,
अश्कों में न बहा उससे,
आज आईने में देख कर तू, खुद को न तू ऐसे कोस,
नज़रें बदल कर देख ज़रा, हर चेहरे में तू खुद को खोज...

साल की वो आख़िरी रात...

साल की वो आख़िरी रात,
चार दोस्त, हांथों में हाँथ,
कुछ किस्से यार पुराने से,
कुछ ताज़ा नये ज़माने से,
खाने पर लड़ते, बचपन के ज़माने से,
चेहरों में यादों को खोजा करते नये तराने से,
कुछ हसरत नये साल को ताज़ी,
कुछ यादें कल की फीकी बासी,
मिले जो यार, कल गुज़रे ज़माने से,
याद आये, किस्से नये पुराने से,
वो चार दोस्त, हांथों में हाँथ,
साल की वो आख़िरी रात...

इस गुज़रे साल में मैं क्या छोड़ आया हूँ...

इस गुज़रे साल में मैं क्या छोड़ आया हूँ,
जाने क्या-क्या खोया, क्या-क्या पाया हूँ,
कुछ रिश्ते टूटे उलझे से,
कुछ नये जोड़ लाया हूँ,
इस गुज़रे साल में मैं क्या छोड़ आया हूँ...

चाहता उनको रहा जो चाहत के काबिल न थे,
खोजता उनको रहा जो नज़रों से ओझिल रहे,
दूसरों की धुन में खोते-खोते, आज खुद को ही भूल आया हूँ,
इस गुज़रे साले में मैं क्या छोड़ आया हूँ...

आदत खुद की बदल गयी, फिर चाहत क्यूँ न बदल गयी,
नज़रों को पढ़ते-पढ़ते, लफ़्ज़ों की भाषा क्यूँ यह बदल गयी,
यौवन को खोजते-खोजते, बचपन को पीछे छोड़ आया हूँ,
इस गुज़रे साल में मैं क्या छोड़ आया हूँ...

सड़कों पर घूमा करता मैं,
रातों को जगता फिरता मैं,
तकिये के सिरहाने, गीली यादों को छोड़ आया हूँ,
इस गुज़रे साल में जाने क्या छोड़ आया हूँ...

मैला आँचल, गन्दी काया...

मैला आँचल, गन्दी काया,
गोद में मैं, तेरी छाया,
एक चादर तन ढकने को,
नीला अम्बर मन रखने को,
आती जाती हर भीड़ में, पुकार लगाती तू,
मेरा जी भरने को, क्यूँ गिड़-गिडाती तू...

एक रूपया, मैं भूखे पेट,
भद्दी काया, वो मोटा सेठ,
गन्दी, ज़हरीली नज़रों से क्यूँ नज़र लगाता वो,
हवस की आंधी में बह, क्यूँ लार गिराता वो,
गन्दी तेरी काया, पर क्या तुझमे पाया,
मैं सोच-सोच बिलखती, आंसू गिराती तू,
मुझको मैली चादर में ढक, खुद छुप सी जाती वो...

मैं सोचु ये तन ढक कर,
बहकू मन रख कर,
मूँद-मूँद अश्क बहा, क्यूँ मुझे छुपाती तू,
खुद अपनी ही काया में, यूँ छुप सी जाती तू,
क्यूँ यह मैला आँचल, क्यूँ यह गन्दी काया,
जाने क्यूँ नंगी आँखों में, बसती यह गन्दी माया,
जब गन्दी तेरी काया तो क्या तुझमे पाया,
गन्दी, ज़हरीली नज़रों से क्यूँ जिस्म नोचती कैसी माया,
क्यूँ नारी होना हुआ गुनाह,
स्तनधारी होना हुआ गुनाह,
जाने क्यूँ भूले ममता की आवाज़, वो माया,
गन्दी तेरी काया, फिर क्या तुझमे पाया,
जाने क्यूँ जी कर जियी नहीं, तेरी नन्ही छाया,
मैला आँचल, गन्दी काया,
गोद में मैं, तेरी छाया...

अश्कों में खोता बचपन....

रोती, बिलखती ज़िन्दगी, क्यूँ सड़कों पर खोता बचपन,
धुएं और शोर के बीच, अश्कों में खोता बचपन,
भूखे पेट, तरसती आँखे,
फिर भी मुस्कुराती ज़िन्दगी, चमकती आँखे,
कभी किताबों तो कभी फूलों को बेचने की जुगत में खोता बचपन,
तो कभी लाचारी और अपंगता में खोता बचपन,
क्यूँ रोती, बिलखती ज़िन्दगी, क्यूँ सड़कों पर खोता बचपन,
धुएं और शोर के बीच, क्यूँ अश्कों में खोता बचपन...

भूखे पेट, तरसती आँखे,
दो रुपये, तरसती सांसें,
क्यूँ धुओं में खोता बचपन,
चोरी, नशा और ज़ुल्म में पड़,
सड़कों पर रोता बचपन,
ये रोती, बिलखती ज़िन्दगी, ये सड़कों पर खोता बचपन,
धुएं और शोर के बीच, अश्कों में खोता बचपन...

बाबूजी, एक रूपया दे दो,
कहके आया पास मेरे,
चेहरे पर मोती, पेट में भूख,
ले आया वो पास मेरे,
मैंने पुछा, क्या होगा जो एक रूपया मैं दे दूंगा,
बोला वो, एक रूपया जोड़, माँ का पेट मैं भर लूँगा,
गुज़र गया आँखों के आगे, क्यूँ उसका सारा बचपन,
हाँथ जोड़ क्यूँ खड़ा रहा, आँखों के आगे सारा बचपन,
ये रोती, बिलखती ज़िन्दगी, ये सड़कों पर खोता बचपन,
धुएं और शोर के बीच, अश्कों में खोता बचपन....

Sunday, January 1, 2012

क्यूँ जीते है लोग ज़िन्दगी...

सीखा मैंने आज,
क्यूँ जीते है लोग ज़िन्दगी,
तिल-तिल कर, गल-गल कर, क्यूँ जीते है ज़िन्दगी,
द्वेष और घर्णा का रूप रख, चली आती है ज़िन्दगी,
क्यूँ अपनी शर्तों पर यूँ नाचती है ज़िन्दगी,
सीखा मैंने आज, क्यूँ जीते है लोग ज़िन्दगी...

भूख से व्याकुल तन,
भोला-भला बचपन,
एक रुपये को सड़क पर रोती क्यूँ है ज़िन्दगी,
अपनी शर्तों पर क्यूँ नाच नाचती ज़िन्दगी,
सीखा मैंने आज, क्यूँ जीते है लोग ज़िन्दगी...

मैं तो लफ़्ज़ों का प्यासा,
मेरे जीने की आशा,
पर सब तो है, लालच में उद्दंड,
अपनी खता मान कर चुप मैं, देख कर हूँ यह दंग,
सीखा मैंने आज, क्यूँ जीते है लोग ज़िन्दगी...

प्यासा मन, प्यासी आशा,
धूमिल होती सब परिभाषा,
लफ़्ज़ों का माया-जाल,
कुबेर, धन से क्यूँ कंगाल,
एक-एक रुपयों को तरसती क्यूँ है ज़िन्दगी,
भूख और मजबूरी से, बेबस क्यूँ है ज़िन्दगी,
सीखा मैंने आज, क्यूँ जीते है लोग ज़िन्दगी...