Wednesday, August 31, 2011

रात ऐसे गुज़रेगी...


रात ऐसे गुज़रेगी, मैंने सोचा न था,
दिल पर बात ऐसे गुज़रेगी, मैंने सोचा न था,
ऐसे होगा मेरी ख्वाहिशों का क़त्ल, मैंने सोचा न था,
ऐसा होगा मेरे दर्द का इम्तेहान, मैंने सोचा न था,
झगड़ा लाज़मी न था करना, फिर भी कर बैठे,
आंसुओं का सबब लाज़मी न था, फिर भी बिखर बैठे,
ऐसे होगा मेरे अरमानों का बलात्कार, मैंने सोचा न था,
ऐसे होगा मेरे दर्द का इम्तेहान, मैंने सोचा न था,
रात कुछ यूँ गुज़रेगी, मैंने सोचा न था,
दिल पर ज़ख्मों के साथ ऐसे गुज़रेगी, मैंने सोचा न था…

आदत अच्छी नहीं...

ये चाहत कुछ अच्छी नहीं,
दर्द की आहट कुछ अच्छी नहीं,
बस दिल तड़पता रहता है अंदर-अंदर,
यूँ जज्बातों से खेलने की आदत अच्छी नहीं…
चाहतों का, दर्द क्यूँ बढ़ जाता है,
ख्वाहिशों का, मर्ज़ क्यूँ बढ़ जाता है,
दिल को बस एक आस पर ज़िन्दा रख लेते है लोग,
क्यूँ ये चाहत का असर पड़ जाता है,
यूँ दर्द की आदत अच्छी नहीं,
ऐसी चाहत अच्छी नहीं…

Tuesday, August 30, 2011

ख़्याल-इ-दिल, सवाल-इ-दिल…

क्यूँ दिन नहीं गुज़रता, क्यूँ रात नहीं होती,
क्यूँ आँखों-आँखों में, तुझसे बात नहीं होती,
क्यूँ, अब मेरी हर बात का सबब तुझसे बन बैठा है,
क्यूँ, अब मेरी आँखों में यूँ, रोज़ बरसात होती है,
क्यूँ दिन नहीं गुज़रता, क्यूँ रात नहीं होती,
क्यूँ आँखों-आँखों में, तुझसे बात नहीं होती…

क्यूँ खाली है राहें, क्यूँ सर्द हवाओं का साथ है,
क्यूँ दर्द घुलता रहता है दिलों में, क्यूँ अच्छी न लगती हर बात है,
क्यूँ दिल में उसका ख़्याल रहता है,
क्यूँ हाल-इ-दिल सवाल रहता है,
क्यूँ दर्द की सिरहन उठती है दिलों में,
क्यूँ राहत का न साथ है,
क्यूँ खाली है राहें, क्यूँ सर्द हवाओं का साथ है,
दर्द घुलता रहता है दिलों में, क्यूँ अच्छी न लगती कोई बात है…

यूँ, दिल लगाना अच्छा नहीं,
यूँ, बेफिजूल मुस्कुराना अच्छा नहीं,
यूँ, दर्द में बद से बदतर हो जाना अच्छा नहीं,
यूँ, शोलों पर नंगे पाव चलते जाना अच्छा नहीं,
यह इश्क का खुमार, बन मेरे दर्द का सबब,
चेहरे पर शिकन, आँखों में नमी की झलक,
आईने में यूँ खुद को देख, दर्द से लिपट जाना अच्छा नहीं,
यूँ, बेफिजूल मुस्कुराना अच्छा नहीं,
ये दिल लगाना अच्छा नहीं…

कभी, खुद से यूँ बात न होती,
तो लफ़्ज़ों की यूँ बरसात न होती,
होती मेरी राहें भी तनहा,
न सूखे पत्तों की सौगात होती,
तड़पती रहती मेरी आहें अंदर,
न, नए सूरज की आस होती,
तू न होता, तेरी जुत्सुजू न होती,
न यूँ लफ़्ज़ों की बरसात होती,
मेरी राहें भी तनहा होती,
जो यूँ खुद से बात न होती…

मुबारक हो ईद…

रोज़े की नमाज़, शिरी, सेवियां और ख़ीर,
तीस दिन का रोज़ा, बदली तकदीर,
अल्लाह के बन्दे, अल्लाह की मेहेर,
बच्चों को इदी, बड़ों को मुबारक हो ईद…

लफ्ज़ हर एक पाक है...

लफ्ज़ हर एक पाक है, उर्स की रात की तरह,
जज़्ब हर बा-नोश है, गुलाबी बाग़ की तरह,
मेरे लफ़्ज़ों को बेमतलब न बोलो काफिर,
यह तो इबादत है उस अल्लाह पाक की तरह,
लिख यूँ ही देता हूँ, कुछ न कुछ खुद-ब-खुद,
पर दिल से हर लफ्ज़ जुड़ा है, एक नए साज़ की तरह,
मेरे लफ़्ज़ों को बेमतलब न समझो काफिर,
यह तो इबादत है उस अल्लाह पाक की तरह…

आज दूरी बहुत ज्यादा है...

आज खुद के अरमानों को पाने की कोशिश में हारा इंसान,
बचपन की यादों के आगे, बेबस और नकारा इंसान,
कल छोटी नेकरों में, भविष्य की ओज लिए तकती आँखों में,
आज सपनों की लहर न वो ताज़ा है, आज दूरी बहुत ज्यादा है,
वो चव्वनी की टॉफी, वो पतंग के कन्ने,
आज गले में है, बस टाई के फंदे,
वो किताबों के बोझ से झुकती कमर,
आज फाइलों में, परिवार का बोझ ज्यादा है,
क्यूँ मुझमे बचपन की यादें ताज़ा है, आज दूरी बहुत ज्यादा है…

Monday, August 29, 2011

चेहरों के पीछे...

चेहरों के पीछे कई चेहरे छुपे होते है,
नज़रों के घाव क्यूँ गहरे होते है,
काश! हम भी झूठे चेहरे बनाना सीख लेते,
तो न दिल पर ज़ख्म इतने गहरे होते…
चेहरों की भाषा क्यूँ पढ़ नहीं पाती आँखे,
क्यूँ हर चेहरे को अपना मान लेती है आँखे,
काश! हम भी समझ लेते झूठे चेहरों के खेल,
तो न दिल पर यूँ ज़ख्म इतने गहरे होते,
चेहरों के पीछे कई चेहरे छुपे होते है,
नज़रों के घाव क्यूँ गहरे होते है…