कभी आयतों में लिखा तुझे,
कभी ख्वाहिशों में जिया तुझे,
अब, तुझ में सिमट कर रह गए है हम,
हमे जगाने की जिरह न कर ।
ख्वाहिशों का पुलिंदा भी उछाला हवा में,
पर वो न मिला जो उम्मीद-ए-दिल था ।
ज़िरह कीजे भी तो क्या कीजे,
इश्क़-ए-आरज़ू लिए फिरते है वीराने में ।
शिकायतें भी की तुझसे, इनायतें भी की तुझसे,
पर वो न मिटा, जो दिल में गिला था ।
बदलना, फ़ितरत-ए-आम है लोगों में,
तुम न बदलों तो लोगों को गुरेज़ नहीं ।
वक़्त बदलता है, हालात बदलते है,
लोग बदलते है, जज़्बात बदलते है,
कभी, मोसकी से मातम के तराने बदलते है,
और कभी साथ-साथ चलते हुए अफ़साने बदलते है ।
खुश हूँ पर खुश नहीं जाने क्यूँ गम है,
सावन के बादल है, अन्दर, पतझड़ मौसम है ।
एक अजीब सा मातम है छाया सारे सब्ज़-बाग़ में,
बे-ख़याली का मंज़र यूँ भी होगा सोचा न था ।
आईना देख, आज रोया मैं भी,
कोई अपना सा देख रहा न गया ।