Thursday, December 5, 2013

दिन पर दिन...

बहुत मतलबी हो गया हूँ तुझसे मिलने के बाद,
तेरे जाने के डर से रूह को तकलीफ़ होती है ।

दिन पर दिन तुझसे मोहोब्बत करते-करते,
कब आदत सी बन गयी ख़बर नहीं ।

बड़ी परेशां सी गुजरी है रात,
सोचता हूँ सुबह का हश्र क्या होगा ।

आज, फिर उसका दिल दुखाया है,
सोचता हूँ खुद को सजा क्या दूं ।

मंदिरों के बाहर एक कतार देखी है मैंने,
ज़िन्दगी की आस में हाँथ जोड़े खड़े रहते है ।

आधे अक्षर में पूरी मोहोब्बत की मैंने,
आधे, लफ़्ज़ों को लफ़्ज़ों में ही छोड़ा अभिनव ।

बड़े चेहरे बदलने पड़ते है वक़्त-दर-वक़्त,
टूट कर, एक ऐसा भी हुनर पाया हमने ।

बर्दाश्त की भी हद देखी है अभिनव,
हम पर भी इश्क़ का कुछ यूँ रंग चढ़ा ।

ख़्वाबों की भी बोलियाँ लगती है इस बाज़ार में,
आशिकों की फितरत कुछ ऐसी भी देखी है ।

बहुत दिनों बाद मुलाक़ात हुई तुझसे,
सोचता हूँ कुछ पल यूँ ही ठहर लूं ।

बड़ी गफ़लत है ज़िन्दगी,
तू पास भी है फिर भी एक दूरी है ।

पुरानी तस्वीरें देख कर गहराता है प्यार तेरा,
मैं ये सोचता हूँ कि कशिश तस्वीरों में है या प्यार में तेरे ।

इश्क़ के बाज़ार में सौदे भी अजीब किये मैंने,
कि, हर जगह बस दर्द का मुनाफ़ा हो गया ।

दिखता है चेहरा ही बाज़ार में,
यहाँ इश्क़ में दिल नहीं दिखा करते ।

बहुत टटोल कर हाल-ए-दिल ये जाना,
कि, मरते भी तुम पर, डरते भी तुम पर ।

मैंने देखे है बहुत से अभिनव,
पर देखा नहीं मुझसा साकी ।

ख़्वाबों की बुलंदियों पर उलझा कोई बाशिंदा है,
ख्वाहिशों की आस में सुलझा कोई नुमायिन्दा है,
चल तो रहा है वो, पर वजह क्या है,
ज़ख्म बहुत सारे है, पर सज़ा क्या है,

क्या अजब सा रिश्ता है तेरा-मेरा,
दूर हो के भी ख़ुशी और पास न हो के भी गम है ।

तलाश-ए-लफ्ज़ की शिरकत लिए चलते गए,
और कहते गए उनसे, चलो, मुकम्मल हुआ तो फिर मिलेंगे ।

क्यूँ मौजूद नहीं हूँ खुद में,
जाने कैसा ये खालीपन है ।

रूह सी कांप जाती है तेरे जाने के डर से,
सोचता हूँ, बिन तेरे ज़िन्दगी का हश्र क्या होगा ।

लफ्ज़ भी नहीं मिलते मुनासिब बिन तेरे,
कैसा ये तुझसे नाता जुड़ा है ।

ताज़गी सी लिए फिरता हूँ वक़्त-हर-वक़्त,
कुछ इस तरह तेरी रूह मेरे साथ होती है ।

ज़र्रा-ए-फ़राश से निकला है अभिनव,
मुझको, मातम की चीख़ों में ढ़ेर न कर ।

बहुत ख़ामोशी है शहर में,
शायद अन्दर उथल-पुथल है ।

बस खफ़ा हूँ शायद खुद से ही,
कि होता वही है जो चाहता नहीं ।

काँच के टुकड़ों सा बिखर गया हूँ मैं,
मेरे वजूद की कोई रिहाइश नहीं बाकी ।

कुछ यूँ ही...

संग-दिल हो कर, हमने भी देखे है ज़माने कई,
पर, कुछ भी नहीं ख़ाक के सिवा ।

एक खालीपन सा लिए फिरते रहा मैं,
ता-उम्र ज़िन्दगी ।

तलाश-ए-अक्स में शख्स की मौत हुई,
और, यूँ ही गुज़री बे-वजह ज़िन्दगी सारी ।

सब अकेले ही चलते है राहों में,
कोई साथी नहीं मेरा अभिनव ।

तुम भी रुक ही गए आख़िर,
एक वक़्त की नुमाइश ऐसी हुई ।

कहीं दूर चले जाना चाहता हूँ मैं,
जहाँ, मुझको मैं सुनाई न दूं ।

तमाशबीन से मिलते है मंज़र सारे,
बस मैं नहीं मिलता आज-कल ।

मेरे दर्द की नुमाईश कुछ हुई ऐसे,
कि, रो भी न सका और हँसता भी रहा अभिनव ।

नज़रें बदल गयी शायद मेरी,
आज, मैं ही नहीं मिलता भीड़ में अक्सर ।

ज़िन्दगी का क्या है, कट ही जाती है कटते-कटते,
बस साँसों की ये डोर ही नहीं कटती अभिनव ।

Monday, December 2, 2013

तेरी याद में जलता हूँ मैं...

एक डोर सा बंधा चलता हूँ मैं,
पल, हर पल पलता हूँ मैं,
जाने क्यूँ गलता हूँ मैं?
शायद, तेरी याद में जलता हूँ मैं ।

तू है, और नहीं भी,
तुझसे मिलने, को लक़ीरें मलता हूँ मैं,
खुश भी हूँ, और हूँ भी ख़फ़ा,
उसकी (खुदा) ख़ताओं को माफ़ करता हूँ मैं,
जाने क्यूँ गलता हूँ मैं,
शायद, तेरी याद में जलता हूँ मैं ॥

चेहरों से नफ़रत हो गयी,
क्यूँ तुझसे मोहोब्बत हो गयी,
तेरे होने का यक़ीन लिए चलता हूँ मैं,
तेरी खुशियों में ही दुनिया लिए चलता हूँ मैं,
फिर भी, जाने क्यूँ गलता हूँ मैं,
शायद, तेरी याद में जलता हूँ मैं ॥।

Thursday, November 28, 2013

लिख रहा हूँ...

एक शहर लिख रहा हूँ, एक गाँव लिख रहा हूँ,
पीपल की पत्तियों की छाओं लिख रहा हूँ,
भीड़ में गुम होता हुआ एक पाँव लिख रहा हूँ,
एक शहर लिख रहा हूँ, एक गाँव लिख रहा हूँ ।

लोगों की अंधी चाल, के ख्वाब लिख रहा हूँ,
कुछ उलझे-उलझे से जवाब लिख रहा हूँ,
भूला-बिसरा एक नाम लिख रहा हूँ,
भीड़ में गुम होता हुआ एक पाँव लिख रहा हूँ,
पीपल की पत्तियों की छाओं लिख रहा हूँ,
एक शहर लिख रहा हूँ, एक गाँव लिख रहा हूँ ॥

Monday, November 25, 2013

नक़ल-अकल...

गहन समस्या जान के, बोल बचन बतलाये,
चोरी हुआ जो सौंदर्य-चरित, गलत हाँथों में पड़ जाए,
कोई, बाल ज्यूँ ही बनाये, एक से कपड़े भी सिलवाये,
गहन समस्या जान के, बोल बचन बतलाये ।

दो कुंवारी बालाए, एक-एक मुस्काये,
एक कुंवारी पूर्ण सुंदरी, दूजी नक़ल-अकल किये जाए,
अतः वीणा पहली की किन्तु दर्द भी कैसे बतलाये,
दूजी भी जो करे नक़ल, अकल पर बल पड़ जाए,
देख विरह पहली की अभिनव, कलम, रगड़-रगड़ चलाये,
गहन समस्या मान के, बोल बचन बतलाये,
रहो सुखी अपने तन-भीतर, नक़ल न मोल बढ़ाये,
नक़ल का रंग चढ़ा जो सजनी, अकल पर जंग लगाये,
रहो पथिक, दुनिआ से अलग, तो ज्यों मान बढ़ाये,
गहन समस्या जान के, बोल बचन बतलाये ॥

जैसी जिसकी चाकरी, तैसो चढ़ियों मांड,
नक़ल-नक़ल में छोकरी, अकल भी चढ़ जाए टांड़,
दूजी की जो नक़ल करे तो खुद का करे अमान,
रूप-सरूप परिपूर्ण सुंदरी, त्यों, नक़ल को रख दे टांड ॥।

रहो सुखी अपने तन-भीतर, नक़ल न मोल बढ़ाये,
नक़ल का रंग चढ़ा जो सजनी, अकल पर जंग लगाये,
रहो पथिक, दुनिआ से अलग, तो ज्यों मान बढ़ाये,
गहन समस्या जान के, बोल बचन बतलाये ॥॥

Wednesday, November 13, 2013

ज़माना...

जलता तो ज़माना भी है मुझसे,
तेरी क्या मैं सिर्फ़ बात करूँ,
मरता तो ज़माना भी है मुझ पे,
तेरी क्या मैं सिर्फ बात कहूं,
जलती है औरों की हसरत,
तेरी क्या मैं सौगात कहूं,
जलता तो ज़माना भी है मुझसे,
तेरी क्या मैं सिर्फ़ बात करूँ ।

सीखा है...

जोड़-तोड़ कर, तोड़-जोड़ कर,
मैंने रहना सीखा है,
मोड़-ओढ़ कर, तोड़-मोड़ कर,
मैंने बहना सीखा है,
मैं हवा नहीं, हूँ पत्थर सा,
खुद से ये कहना सीखा है,
जोड़-तोड़ कर, तोड़-जोड़ कर,
मैंने रहना सीखा है ।

चल-चल कर, मीलों मल कर,
छालों में रहना सीखा है,
लगन-लगन में, देख अगन को,
जलते रहना सीखा है,
दूजों की मुस्काई खुशियों में,
खुश रहना सीखा है,
मैं हवा नहीं, हूँ पत्थर सा,
खुद से ये कहना सीखा है,
जोड़-तोड़ कर, तोड़-जोड़ कर,
मैंने बहना सीखा है ॥